दादी-नानी और पिता-दादाजी के बातों का अनुसरण, संयम बरतते हुए समय के घेरे में रहकर जरा सा सावधानी बरतें तो कभी आपके घर में डॉ. नहीं आएगा. यहाँ पर दिए गए सभी नुस्खे और घरेलु उपचार कारगर और सिद्ध हैं... इसे अपनाकर अपने परिवार को निरोगी और सुखी बनायें.. रसोई घर के सब्जियों और फलों से उपचार एवं निखार पा सकते हैं. उसी की यहाँ जानकारी दी गई है. इस साइट में दिए गए कोई भी आलेख व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं है. किसी भी दवा और नुस्खे को आजमाने से पहले एक बार नजदीकी डॉक्टर से परामर्श जरूर ले लें.
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नोट : यहाँ पर प्रस्तुत आलेखों में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी को संकलित करके पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयास किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि इनमें बताई गयी दवाओं/तरीकों का प्रयोग करने से पूर्व किसी योग्य चिकित्सक से सलाह लेना उचित होगा।-राजेश मिश्रा

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रविवार, मई 03, 2015

प्राणायाम-योग और आयुर्वेद

सब रोगों की दवाई-आसन, प्राणायाम और ध्यान
Yogasan, Pranayam and Dhyan

प्राणायाम दो शब्दों के योग से बना है-(प्राण+आयाम) पहला शब्द "प्राण" है दूसरा "आयाम"। प्राण का अर्थ जो हमें शक्ति देता है या बल देता है। सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने वाले डॉक्टर अब प्राणायाम, योग, ध्यान करके खुद भी स्वस्थ बनाने में जुट गए हैं। योग-प्रक्रियाओं के अन्तर्गत प्राणायाम का एक अतिविशिष्ट महत्त्व है। पतंजलि ऋषि ने मनुष्य-मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग की विधान किया है। प्रकृति का नियम है कि प्रत्येक चल वस्तु, प्रत्येक क्रियाशील जड़ या चेतन में समय समय पर कुछ न कुछ खराबी निरंतर कार्य करने के कारण आ जाती है। मनुष्य का शरीर इसका अपवाद नहीं है। अतः एव नाना प्रकार की व्याधियों से भी मनुष्य ने अपनी रक्षा के साधन तलाश किये। रोगों से छुटकारा पाने के लिये नाना प्रकार की औषधियों को खोजा। उपचार के नियम बनाये। 
सदा मानव हित का चिन्तन करने ऋषि मुनियों का ध्यान विशेष रूप से इस और गया। इसी संदर्भ में महर्षि पतंजलि ने योगासनों का अविष्कार अथवा उनका चलन किया। बतलाया कि मनुष्य नित्य नियमित रूप से कुछ समय के लिये शारिरिक क्रियाएं कर अपने शरीर की संचालन व्यवस्था को सुचारू रूप से ठीक रख सकता है। ऐसा करने पर किसी भी प्रकार का रोग उसे पकड़ न सकेगा। उसका शरीर स्वस्थ बना रहेगा। वह दीर्घायु भी हो सकता है।

प्राणायाम-योग और आयुर्वेद पुरातन भारतीय संस्कृति की विश्व को अनुपम देन हैै।
प्राणायाम सभी चिकित्सा पद्धतियों में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसके नियमित और विधिवत अभ्यास से समस्त स्नायु कोष, नस नाडि़याँ, अस्थियाँ, मांसपेशियाँ और अंग प्रत्यंग के रोग दूर होकर वे सशक्त और सक्रिय बनते हैं, प्राणशक्ति व जीवनीशक्ति बढ़ती है, सप्तधातुएं परिपुष्ट होती हैं। प्राणायाम से शारिरिक एवं मानसिक लाभ के साथ आध्यात्मिक उन्नति भी होती है।

सावधानियां

  • स्नान करके करें अन्यथा प्राणायाम-योगाभ्यास के आधा घंटा विश्राम के पश्चात स्नान करें।
  • प्राणायाम-योगाभ्यास के आधे घण्टे पश्चात पानी, जूस एवं एक घण्टे बाद ही भोजन आदि लें तथा भोजन के पांच घण्टे के अन्तराल पर ही प्राणायाम एवं योगासन करें।
  • रोगी/अस्वस्थ न करें। महिलाएं माहवारी व गर्भावस्था में आसन न करें।
  • श्वसन क्रिया में मुहँ बंद रखें नासिका का उपयोग करें। कमरदर्द वाले आगे झूकने वाले
  • आसन न करें तथा हर्निया के रोगी पीछे झूकने वाले आसन न करें।
  • अभ्यास के दौरान मल, मूत्र, छींक, खांसी आदि न रोकें। विसर्जित करके करें।
  • जल्दबाजी/प्रतिस्पर्धा/जबरदस्ती/झटके के साथ न करें।

शारिरिक स्थिती

  1. साधकगण किसी भी एक आसन सुखासन, वज्रासन पद्मासन, सिद्धासन मे बैठेंगे जो आपको सुखकर लगे व अधिक समय तक बैठ सकें।
  2. सिर गर्दन मेरूदण्ड को एक सीधी रेखा में सीधा रखें। चेहरा सामने सीधा रखें।
  3. आंखे कोमलता से बंद ताकि मन अंर्तमुखी हो बाहरी दृश्यों में चित्त अटके नहीं।
  4. चेहरे पर प्रसन्नता के भाव, किसी प्रकार का कोई तनाव नहीं।
  5. कोई भी एक मुद्रा लगा लें-ध्यान मुद्रा, पृथ्वीमुद्रा, वायुमुद्रा, प्राणमुद्रा, शुन्यमुद्रा मुद्रा में सीधी रहने वाली अंगुलियां सीधी रहें । 
  6. तीन बार ओउम् का उच्चारण लम्बा गहरा श्वांस नाक के द्वारा फेफड़ों में भरें और ओउम् का उच्चारण नाभि की गहराई से करें। तीन बार करेंगे।

प्रार्थना

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत।। 
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमयः, मृत्योर्मा अमृतम गमय।
ओम शान्ति शान्ति शान्ति

भ्रस्त्रिका प्राणायाम

  • श्वांस को लम्बा गहरा धीरे-धीरे नाक के द्वारा फेफड़ों में डायफ्राॅम तक भरेंगे पेट नहीं फुलायेंगे और श्वासं बिना अन्दर रोके, लिये गये श्वांस को नासिका द्वारा धीरे धीरे पूरा ही बाहर छोड़ देंगे तथा बाहर भी श्वांस को बिना रोके पूर्व की भांति श्वासं को भरेंगे। इस अभ्यास को जारी रखें।
  • नये साधक थकने पर बीच में कुछ देर के लिये विश्राम कर सकते हैं। तथा अपने उथले श्वासं की गहराई को बढ़ाने का प्रयास करें।
  • गर्मी में 3 मिनट व सर्दी में 7 मिनट तक किया जा सकता है।
लाभ : सर्दी, जुकाम, पुराना नजला, क्षय, आदि समस्त कफ सम्बन्धी रोग दूर होते हैं। थाॅयराईड, टांसिल आदि गले सम्बन्धी रोगो में लाभकारी। अतिनिद्रा अनिद्रा, आलस्य से मुक्ति। फेफड़े, हृदय एवं मस्तिष्क स्वस्थ होता है।

सूक्ष्म व्यायाम

  • पैर की अंगुलियां तथा अंगूठे आगे तथा पीछे की और दबायें एडि़या स्थिर रखें।
  • दोनों पैरों को मिलाते हुये पूरे पंजे को एड़ी सहित आगे पीछे दबाऐं 
  • दोनों पैरों को मिलाते हुये पूरे पंजे को एड़ी सहित गोल घुमायें।
  • दोनो पैरों को थोड़ी दूरी पर रखें। दोनों पैरों के अंगूठे अन्दर की और दबाते हुये मिलाएं, फिर दोनों पैरों के पंजे वृत्ताकार घुमाते हुये शून्य जैसी आकृति बनायें
  • पैरों को सीधा रखते हुए दोनों हाथों को कमर के दोनों साईड में रखें। 
  • घुटनों की कपाली को दबाते एवं छोड़ते हुए आकुंचन एवं प्रसारण की क्रिया।
  • इसके बाद दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे में डालते हुए घुटने के नीचे जंघा को पकड़ें । फिर पैर को मोड़ते हुए नितम्ब के पास लायें और साईक्लिंग जैसी क्रिया करते हुए पैर से सामने की और से शून्य बनायें । दोनों पैरों से करें।
  • दायें पैर को मोड़कर बायें जंघे पर रखें। बायें हाथ से दाएं पंजे को पकड़ें व दाएं हाथ को दाहिने घुटने पर रखें व घुटने को नीचे जमीन पर लगाने का प्रयास करें। अब दाहिने हाथ को दाएं घुटने के नीचे लगाते हुए घुटने को ऊपर उठाकर छाती से लगाएं तथा घुटने को दबाते हुए जमीन पर टिका दें। इसी प्रकार इस अभ्यास को विपरीत बायें पैर को मोड़कर दायें जंघे पर रखकर पूर्ववत करें।
  • अन्त में दोनों हाथों से पंजों को पकड़कर घुटनों को भूमि पर स्पर्श करायें और ऊपर उठायें। इस प्रकार कई बार इसकी आवृति करें। (बटर फ्लाई ) 

कपाल भाति प्राणायाम : 

कपाल अर्थात मस्तिष्क, भाति अर्थात तेज, प्रकाश आभा, यानि जिस प्राणायाम के करने से आभा, तेज, व ओज बढ़ता हो वह है कपालभाति प्राणायाम विधी:- श्वांस को लम्बा गहरा नासिका के द्वारा फेफड़ों में भरेंगे और लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके नासाछिद्रों द्वारा प्रयासरत होकर इस प्रकार छोड़ेंगे कि श्वांस को बाहर छोड़ने के साथ ही पेट अन्दर की और पिचके। श्वांस भीतर जा रहा है उस और ध्यान नहीं देते हुए लगातार छोड़ने की क्रिया करनी है। मध्यमगति व मध्यम शक्ति के साथ करें व नये साधक थकने पर कुछ देर बीच में विश्राम कर सकते हैं। श्वांस को अधिक गहराई के साथ छोड़ने का प्रयास करें। और दिन प्रतिदिन लगातार करने की अवधि में वृद्धि करते हुये 5 से 10 मिनट तक करने की क्षमता का विकास करें।

ग्रीष्म ऋतु में पित्त प्रकृति वाले 2 मिनट ही करें। तीव्र गति से सांस को बाहर छोड़ने के लिये झटके से पेट हिलाने से पेट और वेट दोनों कम होते हैं। पाचन शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। कब्ज समाप्त होती है। हार्ट के ब्लाॅकेज खुल जाते हैं, फेफड़ो की स्वच्छता होने से अस्थमा जैसा असाध्य रोग समाप्त हो जाता है। रक्तशुद्धि होने से त्वचा रोग, एक्जिमा, एलर्जी स्वतः समाप्त होते हैं। पेट के विकार मिटने से मुखमण्डल पर तेज, आभा, कान्ति, लावण्य आता है। 

हाथों व कन्धे के व्यायाम

  • हाथों की अंगुलियों को परस्पर मिलाते हुये मोड़ना, हाथों को सामने की और फैलाकर अंगुलियों के पोरों को धीरे-धीरे मोड़ें सीधा करें। इसके पश्चात अंगूठे व अंगुलियों को मोड़कर दबाते हुए मुक्का जैसी आकृति बनायें फिर धीरे-धीरे खोलें ऐसा 5-7 बार करें। अब अंगुठे को मोड़कर अंगुलियों से दबाते हुए दोनों हाथों की मुटिठयों को बन्द करके क्रमशःदोनों और घुमायें। कोहनियां सीधी रहनी चाहिये।
  • अब कोहनियों के लिये कोहनी को दूसरे हाथ की हथेली पर रखकर दोनों और गोल घुमायें।
  • अब कन्धे के लिये दोनो कन्धों को क्रमशः ऊपर नीचे करें फिर आगे व पीछे की और गोल घुमायें।
  • अब गर्दन के लिये सीधे बैठकर सिर्फ गर्दन को 3 बार दायीं-बायीं और घुमायें। अब गर्दन को घुमाते हुए पहले दाहिने कन्धे से लगायें इसी तरह बायें कन्धे से छूएं। अब गर्दन को आगे झूकाते हुये ठोडी को छाती से लगायें फिर धीरे धीरे यथाशक्ति पीछे की और झूकायें। अन्त में गर्दन को वृत्ताकार में दोनों दिशाओं में क्रमशः घुमाना चाहिये।

बाह्य प्राणायाम त्रिबन्ध के साथ

  • श्वांस को लम्बा गहरा नासिका के द्वारा फेफड़ों में भरेंगे और लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके, नासिका के द्वारा प्रयासरत होकर एक ही बार में पूरा बाहर छोड़ते हुये सर्वप्रथम मूलबन्ध लगाने के लिये अपने मलद्वार अथवा गुदा को अन्दर की और संकुचित करेंगे। बाद में उड्यानबन्ध लगाने के लिये पेट को अन्दर की और पिचकायेंगे, इसके बाद ठोडी को कण्ठकूप में लगाते हुये जलंधरबन्ध लगायेंगे 
  • गर्दन दर्द वाले रोगी आगे गर्दन न झूकायें।
  • इस प्रकार श्वासं छोड़ते हुये मूल,उड्यान,जलंधर बन्ध लगायेंगे। जितनी क्षमता हो श्वासं को बाहर छोड़कर रोकना है।
  • हृदयरोगी, उच्चरक्तचाप व दमे के रोगी न करें
  • तत्पश्चात श्वांस को लेने से पूर्व जलन्धर बंध खोलें, फिर उड्यान बंध और उसके बाद मूलबंध खोलते हुए श्वांस भरें। इस प्रकार 3 अथवा 5 बार करें। लाभः- वात, पित्त, कफ का संतुलन होता है।
  • शरीर में उर्जाप्रवाह बढता है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है, उदर रोगों में लाभ।
  • बुद्धि कुशाग्र होती है। स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि गुप्तरोगों का शमन होता है।
  • बाह्य प्राणायाम करने के पश्चात अग्निसार की क्रिया करेंगे। श्वांस को लम्बा गहरा नासिका के द्वारा फेफड़ों में भरेंगे और लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके, नासिका के द्वारा प्रयासरत होकर एक ही बार में पूरा बाहर छोड़कर रोकेंगे अब पेट को अन्दर बाहर लहरायेंगे, जितनी देर श्वासं को बाहर छोडकर रख सकते हैं। एक बार ही करना काफी है।
लाभ:- जठराग्नि प्रदीप्त होती है। कब्ज व अपच ठीक होता है।

चेहरे के व्यायाम व पोईन्ट्स

  • पूरे चहरे को अच्छी तरह से थपथपायेंगे (कुदरती सौन्दर्य व चेहरे पर एक्यूप्रेशर पोइन्ट्स दबते हैं।)
  • अब गर्दन के पीछे मसाज करेंगे (गर्दन दर्द व मस्तिष्क में अच्छे रक्तसंचार के लिये।)

अनुलोम विलोम प्राणायाम

दांये हाथ को ऊपर उठायें। दांये हाथ के अंगुठे से दाहिनी नासिका बन्द करें और बांयी नासिका से श्वांस को लम्बा गहरा धीरे धीरे फेफड़ों में भरेंगे। पूरा श्वांस भरने के पश्चात दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से बांयी नासिका को बन्द कर देंगे व अंगूठे को दांयी नासिका से हटा लेंगे अर्थात दांयी नासिका खोलते हुये, लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके दांयी नासिका से धीरे धीरे पूरा बाहर छोड़ देंगे तथा बाहर भी श्वांस को बिना रोके जिस नासिका (दांयी) से श्वांस बाहर छोड़ा है उसी नासिका से श्वांस को धीरे धीरे फेफड़ों में भरेंगे। पूरा श्वांस भरने के पश्चात दायें हाथ के अंगुठे से दाहिनी नासिका बंद कर देंगे और बांयी नासिका पर से अनामिका अंगुली हटाते हुये लिये गये श्वांस को बिना अन्दर रोके बांयी नासिका से धीरे धीरे पूरा बाहर छोड़ देंगे। यह एक आवृति अनुलोम विलोम प्राणायाम की हुई ।
दिन प्रतिदिन लगातार करने की अवधि बढ़ाते हुये 5 से 15 मिनट करें।
लाभ: इस प्राणायाम से सांसों का शुद्धिकरण होने से पूरे नाड़ी तंत्र का शोधन होता है, इससे दूषित वायु शरीर से बाहर निकलती है व आॅक्सीजन की मात्रा शरीर में बढ़ जाती है। इससे सन्धिवात, गठिया, कम्पवात, स्नायुदौर्बल्य आदि समस्त वातरोग एवं सर्दी, जुकाम, सायनस, खांसी, टाॅन्सिल, अस्थमा, आदि समस्त कफ रोग दूर होते हैं। त्रिदोषनाशक है। हृदय के ब्लाॅकेज खुलते हैं। सिरदर्द, माइग्रेन, मानसिक तनाव दूर होता है व विवेक जाग्रत होता है।

आसन

उत्तानपादासन:- पीठ के बल लेट जायें। हथेलियां भूमि की और, पैर सीधे, पंजे मिले हुये हों । अब श्वांस भरकर एक पैर को 1 फुट तक धीरे धीरे ऊपर उठायें। 10 सैकण्ड रोके फिर धीरे धीरे पैरों को नीचे भूमि पर टिकायें। फिर क्रमशः दूसरे पैर से करें। 3 से 6 बार ।
अब यही क्रिया दोनों पैरों को एक साथ उठाकर क्रमशः करें। 3 से 6 बार ।
कमरदर्द वाले एक एक पैर से ही क्रमशः इस अभ्यास को करें।
कब्ज, गैस, मोटापा, पेटदर्द, नाभि का टलना, कमरदर्द, हृदयरोग में लाभप्रद।
पवनमुक्तासन:- सीधे लेटकर दांये पैर के घुटने को छाती पर रखें। दोनों हाथों को अंगुलियां एक दूसरे में डालते हुये घुटने पर रखें, श्वांस बाहर निकालते हुये घुटने को दबाकर छाती से लगायें एवं सिर को उठाते हुये घुटने से नासिका का स्पर्श करें। 10 से 30 सैकण्ड रोकते हुये फिर पैर को सीधा कर दें। इसी तरह दूसरे पैर से करें। अन्त में दोनों पैरों से एक साथ करें।
वायु विकार, स्त्रीरोग, मोटापा, कमरदर्द, हृदयरोग में लाभप्रद। यदि कमर में दर्द हो तो सिर उठाकर घुटने से नासिका ना लगायें। केवल पैरो को दबाकर छाती से स्पर्श करें। इससे स्लिपडिस्क, सायटिका, कमरदर्द में लाभ होता है। 
पीठ के बल लेट जायें। हथेलियां भूमि की और, दोनों पैरों को निरंतर साईकिल की तरह चलायें। एक पैर घुटने से मोड़कर सीने की तरफ, दूसरा सीधा फैलायें। 10 बार या यथाशक्ति करें। बीच में विश्राम कर इसी प्रकार विपरीत दिशा में भी दोनों पैरों को निरंतर साइकिल की तरह चलायें। कब्ज, मंदाग्नि, एसिडिटी कमरदर्द, मोटापा घटाने में लाभप्रद। 
सेतूबन्धआसन:- सीधे लेटकर दोनों घुटनों को मोड़कर पैरों को नितम्ब के पास रखियें। हथेलियां जमीन से सटी हुई। श्वांस भरकर कमर एवं नितम्बों को उठाइये। कन्धे सिर एडि़यां भूमि पर टिकी रहे। इस स्थिती में 10 सैकण्ड रूकिये वापस श्वांस छोड़ते हुये धीरे धीरे कमर को भूमि पर टिकाईये । इस प्रकार 3-4 बार करें।
पेट दर्द, कमरदर्द, स्त्रीरोग, पुरूष के धातु रोग, नाभि को केन्द्रित रखने में लाभप्रद।
भुजंगासन:- पेट के बल लेटकर दोनों हथेलियां भूमि पर रखते हुये हाथों को छाती के दोनों और रखें। कोहनियां ऊपर उठी हुई तथा भुजायें छाती से सटी हुई होनी चाहिये। पैर सीधे तथा पंजे आपस में मिले हुये हों। पंजे पीेछे की और तने हुये भूमि पर टिके हुये हों। श्वांस अन्दर भरकर छाती व सिर को धीरे धीरे ऊपर उठाइये। नाभि के पीछे वाला भाग भूमि पर टिका रहे। सिर को उपर उठाते हुये गर्दन को जितना पीछे मोड़ सकते हैं, मोड़ना चाहिये। इस स्थिती में करीब 10 से 30 सैकण्ड जितनी देर यथाशक्ति श्वासं रोक सके रूकें। श्वांस छोड़कर पूर्व स्थिती में आ जायें। सवाईकल, स्पोंडलाइटिस, पेट के रोग, स्लीपडिस्क स्त्रीरोग में लाभप्रद। 


शलभासन:-
पेट के बल लेटकर दोनों हाथों को जंघाओं के नीचे लगाइये । श्वांस अन्दर भरकर दायीं टांग उपर उठायें, घुटने मुड़ने नहीं चाहिये। ठोड़ी भूमि पर टिकी रहे। 10 सेकण्ड रूककर श्वांस बाहर निकालते हुये टांग को नीचे लाएं । क्रमशः दूसरी टांग से भी करें। 3 से 5 बार करें। अगले क्रम में दोनों टांगों को साथ उठायें। तीन बार। कमरदर्द वाले दोनों टांगे साथ न उठायें। 
कब्ज, पाचनविकार, एवं कमरदर्द, सायटिका में विशेष लाभप्रद।
नोट: आसनों के अन्त में शरीर को बिल्कुल ढीला छोड शवासन में लेटें - 5 मिनट 

आँखों के व्यायाम-पुतलियों को क्रमशः बीच में विश्राम करते हुये, दाएं बाएं, ऊपर नीचे क्राॅस में, गोल घुमाना, खोलना बन्द करना, अंगुठा सामने रखकर दूर व पास देखना अन्त में आँखो को उष्मा देना।

भ्रामरी प्राणायाम

श्वांस को लम्बा गहरा फफड़ों में भरते हुये, दोनों कानों में अंगुलियां डालकर कानों को बन्द कर देंगे, बाहर की कोई भी ध्वनि सुनाई ना दे। अब मुहं व होठों का बन्द करके जीभ को ऊपर तालु पर लगा देंगे। ओउम का दीर्घ गुंजन, भौरें के उड़ते समय की ध्वनि की तरह करेंगे, जिसमें श्वांस नासिका से गुंजन के साथ बाहर निकलेगा और पूरे मस्तिष्क में कम्पन्न होगा। यह प्राणायाम करते समय अपना ध्यान आज्ञा चक्र भृकुटिद् पर केन्द्रित करेंगे। इस प्रकार 5 से 7 बार दोहरायेंगे। मन एकाग्र होता है, याददाश्त तेज होती है। मानसिक तनाव, उच्चरक्तचाप, हृदयरोग, उत्तेजना में लाभप्रद। 

उद्गीथ प्राणायाम

लम्बा, गहरा श्वांस फफड़ों में भरें और प्रणव का दीर्घ उच्चारण अर्थात नाभि की गहराई से करें। श्वांस भरने में 5 सैकण्ड व छोड़ते समय दो गुना अर्थात 10 सैकण्ड का समय लगावें। स्वर को मधुर व लयबद्ध बनाते हुये आधा समय ‘ओ’ का व आधा ‘म’ का मुहं बन्द रखते उच्चारण करें।
यह प्राणायाम 3 से 5 बार करें। इससे एकाग्रता आती है, मेरूदण्ड, फेफड़े मजबूत होते हैं, श्वांस की गति पर नियन्त्रण होता है। मानसिक शान्ति मिलती है।

सिंहनाद 


  • वज्रासन में बैठकर, थोड़ा झुकते हुये दोनों घुटनों के बीच में हथेलियों को जमीन पर पीेछे की और टिकाकर, गर्दन को घुमायेंगे। अब श्वासं भरकर मुहं खोलकर जीभ बाहर निकालकर ऊपर की और गर्दन करके, आंखें फैलाकर ऊपर देखते हुये गले के अन्दर से शेर की भांति दहाड़ मारेंगे। इस स्थिती में कुछ देर रूकना है। 2-3 बार करना है। सिहांसन करने के पश्चात गले से लार छोड़ते हुये हल्के हाथ से गले की मालिश करनी चाहिये।
  • इससे गले में खराश नहीं होती। टाँसिल, थायराईड व अन्य गले सम्बन्धी रोगों में उपयोगी है।
  • अस्पष्ट उच्चारण, तुतलाकर बोलने वालों के लिये महत्वपूर्ण है।

श्वांस पर ध्यान

अब आंखे बन्द रखते हुये, साक्षी भाव से आती जाती श्वांस का निरिक्षण करेंगे। अपने प्रयास से न लेना है न छोड़ना है जैसे भी चल रही है अन्तर्मन से देखेंगे। 2 से 5 मिनट। श्वांस की गति पर नियन्त्रण होता है। एकाग्रता आती है, जागरूकता बढ़ती है। मन के खयाल शान्त होते हैं। 
नोट: आंखे बन्द करके योगासन करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है। 
मानसिक तनाव व चंचलता दूर होती है।

अन्तर तालिका

व्यायाम व जिम्नास्टिक

1. शरीर के केवल बाह्य मांसपेशियों व मसल को कड़ा व मजबूत बनाता है।
2. इसको करने से शरीर में आलस्य थकावट आती है तथा दूसरे परिश्रम करने की अनिच्छा होती है।
3. अधिक वृद्ध, स्त्री, कमजोर, रोगी वयस्त व्यक्ति नहीं कर सकते।
4. अधिक समय व शक्ति की जरूरत होती है
5. खेल, व्यायाम में हम दूसरी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर रहते हैं, जिसके अभाव में व्यायाम नहीं कर सकते।
6. इसके अभ्यास से शरीर में कठोरता व भारीपन होता है, जिससे ढलती उम्र में वात, गठिया रोग हो जाते हैं। शरीर अल्पायु हो जाता है जैसे - पहलवान, कुश्ती लड़ने वालों का।
7. कुछ समय बाद छोड़ देने से शरीर में कब्ज आदि हो जाते हैं तथा पिछले परिश्रम का कोई गुण धर्म नहीं रहता/ पुनः प्रारंभ करने के लिये वही प्रयत् करना होता है।
8. इसका उपचारात्मक महत्व नहीं है, केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिये है।
9. शरीर के सभी संस्थानों पर इसका प्रभाव व नियन्त्रण नहीं के बराबर है, इससे शरीर की सूक्ष्म शक्तियों का जागरण व विकास नहीं होता।

योगासन

1. शरीर के अन्दर एवं बाह्य दोनों नस नाडि़यों, ग्रन्थियों व मांसपेशियों को लचीला, पुष्ट, सुदृढ बनाता है।
2. इससे शरीर में स्फुर्ति, ताजगी व हल्केपन का अनुभव होता है, अन्य परिश्रम हेतु पूर्ण उत्साह एवं अभिरूचि होती है।
3. इसे सब उम्र के व्यक्ति कर सकते। व्यस्त व्यक्ति भी 10 मिनट निकाल सकते हैं।
4. 10 से 15 मिनट का समय स्वस्थ रहने हेतु पर्याप्त है।
5. योगासन में किसी भी वस्तु, स्थान या व्यक्ति विशेष पर अवलम्बित नहीं रहना पड़ता जब इच्छा वहीं पर कर सकते हैं।
6. इसके अभ्यास से शरीर मुलायम, लचीला व सहनशील बनता है। बीमारी दूर भागती है, दीर्घायु व स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है। वात, गठिया रोग तो हो ही नहीं सकते।
7. कुछ समय के लिये योगासन का अभ्यास छोड देने से शरीर में कोई दर्द नहीं होता। साथ ही आसन के प्रभाव का अनुभव यदा कदा होता है।
8. वर्तमान में इसके उपचारात्मक महत्व को डाॅ. व वैज्ञानिक भी मानते हैं।
9. इससे शरीर की सूक्ष्म शक्तियों का जागरण होकर प्रतिभा एवं शक्ति का समुचित विकास होता है।

कपालभाति के अभ्यास की विधि

ध्यान के किसी भी आसन जैसे पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या कुर्सी पर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर बैठ जाइए। हाथों को घुटनों पर मजबूती से रखिए। अब आंखों को हल्का बन्द कर नासिका द्वारा सामान्य श्वास अन्दर लीजिए तथा हल्के-हल्के श्वास बाहर निकालिए। इस क्रिया का अभ्यास 15 से 25 बार कीजिए। धीरे-धीरे इसकी आवृत्ति 4 से 5 मिनट तक कीजिए। किन्तु उच्च रक्तचाप, हाइपर एसिडिटी तथा हाइपर थायराइड से ग्रस्त व्यक्ति इसका अभ्यास योग्य मार्गदर्शन में करें।

योग निद्रा एवं ध्यान


लगातार मानसिक तनाव, भावनात्मक असंतुलन, निराशा तथा कुंठा में जीने वाले अति आहारी मोटे व्यक्तियों के लिए योगनिद्रा एवं ध्यान रामबाण औषधि की तरह उपयोगी है। यह ऐसे व्यक्तियों की जीवन शैली को सुधारता है।

आहार

मोटे व्यक्तियों को लम्बा उपवास नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों को सादा, सुपाच्य, पौष्टिक तथा संतुलित भोजन लेना चाहिए। टमाटर, लौकी, खीरे के रस में नींबू व शहद मिलाकर लें। ककड़ी, कुलथी, टमाटर, पालक, चने की दाल लें। अंगूर, सेब, पपीता तथा संतरा जैसे फल लें। अधिक मात्र में शर्करा, मिठाइयां, वसा, मसाले, दूध तथा दुग्ध पदार्थ, चावल एवं परिष्कृत आहार कम लें। अनाज, फल, दही एवं सब्जियां पर्याप्त मात्र में लेना चाहिए।

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